। । राम ।।
हनुमानजी सुग्रीवजी के कहने पर जब राम जी से मिले तो राम जी से उनका परिचय पूछा कि आप कौन हैं। तब रामजी अपने विराटरूप-विश्वरूप में आ गए । हनुमानजी आश्चर्य चकित होकर फिर बोले प्रभु आप कौन हैं।
राम जी बोले हनुमान चारों प्रकार के जो जरायुज, उदभिज, स्वेदज, अण्डज जीव हैं- मैं सबकी आत्मा सर्वात्मा हूँ। मैं ही निरगुण और सगुण उभयात्मक रूपों में रहता हूँ।
मैं देवताओं का भी देवता, ईश्वर का भी ईश्वर हूँ । सभी देवी देवता, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्रमा, काल, ऋतु आदि मेरी आज्ञा के अधीन कार्य करते हैं। मैं श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम हूँ। मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। व्रह्मा मेरी आज्ञा से सृष्टि का विस्तार करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं।
मैं सबसे परे हूँ लेकिन मुझसे परे कुछ भी नहीं है। यह सारा व्रह्मांड मेंरी शक्तियों का ही विलास है जो मुझसे ही उतपन्न होकर मुझमें ही लय हो जाता है..........
निर्गुण सगुण उभयात्मक रूपा ।
कहन लगे प्रभु आप सरूपा ।।
सर्वात्मक सर्वेश्वर रामा ।
सर्वशासक परात्पर परधामा ।।
।। जय श्रीराम ।।