नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये आत्मारामाय रामाय सीतारामाय वेधसे ।।


नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम नमस्ते चंडकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ।।


दीन मलीन हीन जग मोते । रामचंद्र बल जीवत तेते ।।
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Tuesday, March 3, 2026

हनुमानजी जैसा राम-रँगीला कोई नहीं है

 

हनुमानन जी जैसा राम-रँगीला कोई तीनों लोकों में और तीनों काल में नहीं मिलता । हनुमानजी का तन और मान रघुनाथ जी के रंग में रँगा हुआ है । रामजी के रसीले चरित्र और गुण गनों में रँगा हुआ है ।

तन मन रँगा राम रंग जाको गुनगन चरित रसीले

तीनकाल तिहुँलोक में ऐसा और नहीं कोउ मीले ।

रामजी के गुनगन और चरित्र को सुनते ही हनुमानजी को रोमांच हो जाता है और उनका तन मन पुलकित हो जाता है और आँखे प्रेम के आँसुओ से गीली हो जाती हैं-

पुलक-रोमांच सुने गुनगन प्रभु, प्रेम वारि दृग गीले


ऐसा लगता है कि मानो साक्षात राम-प्रेम ही मूर्तिमान होकर हनुमानजी के रूप में आ गया है- मानहुँ तनु धरि राम प्रेम आयो है   धन्य हैं हनुमानजी जिनके जैसा न कोई राम-रँगीला पहले था और न अभी है और न ही आगे ही होगा इस प्रकार हनुमानजी जैसा कोई राम-रँगीला नहीं है

 

। जय श्रीहनुमानजी ।।                                       


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