नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये आत्मारामाय रामाय सीतारामाय वेधसे ।।


नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम नमस्ते चंडकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ।।


दीन मलीन हीन जग मोते । रामचंद्र बल जीवत तेते ।।

Sunday, April 5, 2026

भगवान श्रीराम सर्वात्मक, सर्वेश्वर और सर्वशासक हैं

        । ‌। राम ।। 

हनुमानजी सुग्रीवजी के कहने पर जब राम जी से मिले तो राम जी से उनका परिचय पूछा कि आप कौन हैं। तब रामजी अपने विराटरूप-विश्वरूप में आ गए । हनुमानजी आश्चर्य चकित होकर फिर बोले प्रभु आप कौन हैं। 

राम जी बोले हनुमान चारों प्रकार के जो जरायुज, उदभिज, स्वेदज, अण्डज जीव हैं- मैं सबकी आत्मा सर्वात्मा हूँ। मैं ही निरगुण और सगुण उभयात्मक रूपों में रहता हूँ।   

मैं देवताओं का भी देवता, ईश्वर का भी ईश्वर हूँ । सभी देवी देवता, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्रमा, काल, ऋतु आदि मेरी आज्ञा के अधीन कार्य करते हैं। मैं श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम हूँ। मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। व्रह्मा मेरी आज्ञा से सृष्टि का विस्तार करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं। 

मैं सबसे परे हूँ लेकिन मुझसे परे कुछ भी नहीं है। यह सारा व्रह्मांड मेंरी शक्तियों का ही विलास है जो मुझसे ही उतपन्न होकर मुझमें ही लय हो जाता है.......... 

निर्गुण सगुण उभयात्मक रूपा । 

कहन लगे प्रभु आप सरूपा ।। 

सर्वात्मक सर्वेश्वर रामा । 

सर्वशासक परात्पर परधामा ।।


।। जय श्रीराम ।। 

Sunday, March 22, 2026

भगवान श्रीराम ने अपने विराट रूप को दिखाने के लिए किसको दिव्य नेत्र प्रदान किया था


जनकपुर में शिव‌ धनुष तोड़ने के उपरांत राम जी ने अपना विराट रूप परशुराम जी को दिखाया था ।


 भगवान श्रीराम ने अपने विराट रूप को दिखाने के लिए  परशुराम जी को दिव्य नेत्र  प्रदान किया था ।। 


।। जय श्रीराम ।।   

Tuesday, March 3, 2026

हनुमानजी जैसा राम-रँगीला कोई नहीं है

 

हनुमानन जी जैसा राम-रँगीला कोई तीनों लोकों में और तीनों काल में नहीं मिलता । हनुमानजी का तन और मान रघुनाथ जी के रंग में रँगा हुआ है । रामजी के रसीले चरित्र और गुण गनों में रँगा हुआ है ।

तन मन रँगा राम रंग जाको गुनगन चरित रसीले

तीनकाल तिहुँलोक में ऐसा और नहीं कोउ मीले ।

रामजी के गुनगन और चरित्र को सुनते ही हनुमानजी को रोमांच हो जाता है और उनका तन मन पुलकित हो जाता है और आँखे प्रेम के आँसुओ से गीली हो जाती हैं-

पुलक-रोमांच सुने गुनगन प्रभु, प्रेम वारि दृग गीले


ऐसा लगता है कि मानो साक्षात राम-प्रेम ही मूर्तिमान होकर हनुमानजी के रूप में आ गया है- मानहुँ तनु धरि राम प्रेम आयो है   धन्य हैं हनुमानजी जिनके जैसा न कोई राम-रँगीला पहले था और न अभी है और न ही आगे ही होगा इस प्रकार हनुमानजी जैसा कोई राम-रँगीला नहीं है

 

। जय श्रीहनुमानजी ।।                                       


Tuesday, February 10, 2026

जे राम-रँगीले

 

जो राम रँगीले हैं अर्थात  जो लोग राम जी के रंग में रँगे हुए हैं उनका तीनों कालों में अर्थात, भूत, वर्तमान और भविश्य में भला ही होता है । इसलिए हम सबको भी राम जी के रंग में रँग जाना चाहिए 

   समस्या तो तब आती है जब रँगे तो संसार के रंग में होते हैं और दिखाया जाता है कि हम राम के रंग में रँगे हुए हैं । अथवा आधा-अधूरा या केवल कुछ अंश में ही रँगे होते हैं । चलो हम लोग रामजी से और हनुमानजी से प्रार्थना करें कि हमारा मन भी रामजी के रंग में रँग जाए-


रंगों रे मन ! राम रघुवर के रंग ।

जग से नेह लगावत मूरख, कछु नहिं जावत संग ।।१।।

सुख जल खोजत कतहुँ न पावत, दौड़त सरिस कुरंग ।

दिन-दिन घटत आयू बल तन को, जोहत काल भुजंग ।।२।।

मनुज शरीर लहे का पामर, जो नहिं बदले ढ़ंग ।

राम भजे अरु राम गुन गाए, परिहरि कुमति कुसंग ।।३।।

साधु संत रघुनाथ कथा बिनु, बाढ़त तृष्ना तरंग ।

जनम जनम की काई भीतर, धुलत धुलै सत्संग ।।४।।

सुंदर श्याम सुशील सियावर, लाजत देखि अनंग ।

कर सर चाप धरे रघुनंदन, काँधे लसत निषंग ।।५।।

सुमिरत राम सखा करि राखत, प्रीति करत नहिं भंग ।

दीन संतोष दीन जन राखत, बानर-भालु भी संग ।।६।।

 

          ।। जय श्रीसीताराम ।।

Friday, January 9, 2026

हनुमान सम नहिं बड़भागी | नहिं कोउ राम चरन अनुरागी

 

भगवान शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं कि हनुमानजी के समान बड़ा भाग्यशाली दूसरा कोई नहीं है  और न ही कोई हनुमानजी के समान राम जी के चरणों में प्रेम करने वाला है ।

 

  हे गिरिजा ! जिनकी अर्थात हनुमानजी की  प्रीति और सेवा का वर्णन बार-बार स्वयं प्रभु राम ने किया है । उनके समान दूसरा कौन होगा ?

 

  इस प्रकार बड़ा भाग्यशाली होने में और राम चरण अनुरागी होने में हनुमानजी महाराज अद्वितीय है ।

 

  ।। जय श्रीहनुमानजी ।।

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