ब्रह्मांड में जितनी भी सुंदरता है - प्रकृति की सारी सुंदरता एकत्रित रूप में राम जी की सुंदरता के एक कण मात्र के बराबर है । रामजी सुंदरता के समुद्र हैं-छवि को समुद्र लागै कौशिला किशोर ।
सूपनखा नाक कान काटे जाने के बाद जब रावण को रामजी का परिचय देती है तो कहती है- शोभा धाम राम अस नामा। सुंदरता के धाम हैं और राम उनका नाम है। खर- दूषण रामजी को देखते ही कहने लगे कि नाग, असुर, देवता, मनुष्य, मुनि हमने बहुत देखे हैं लेकिन- ' देखी नहिं अस सुंदरताई'।
मिथिला में भी सब लोग यही कहते कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी ऐसे नहीं है। कोई भी शरीरधारी ऐसा नहीं है जो इन्हें देखकर मोहित न हो जाए। जो देखता देखते रह जाता- जँह तँह छवि वरनै सब लोगू।
कितने ही स्त्रियों ने पति रूप में वरण करना चाहा उन्हें अपने अगले अवतार में पत्नी रूप में स्वीकार किया। कितने ही ऋषि मुनि जिनके मन में रामजी को कांत भाव से आलिंगन करने की इच्छा हुई उन्हें गोपी बनाकर उनकी यह इच्छा कृष्णावतार में पूरा किया। ऐसे ही अनेक स्त्रियों को भी गोपी बनाकर उनकी त्रेता युग की इच्छा को द्वापर में पूर्ण किया।
जो जेहि भाव रहा अभिलाषी।
तेहि तेहि कर तस तस रुचि राखी।।
।। जय श्रीराम।।