नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये आत्मारामाय रामाय सीतारामाय वेधसे ।।


नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम नमस्ते चंडकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ।।


दीन मलीन हीन जग मोते । रामचंद्र बल जीवत तेते ।।
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Monday, August 4, 2025

साधु-संत और साधकों का एकांत सेवी होना एक विशेष गुण होता है

 

साधु-संतों और साधकों के कई गुण कहे गए हैं । जिसमें से एक गुण है इनका एकांत सेवी होना ।


हर कोई एकांत सेवी नहीं होता है । कई लोगों के लिए यह बहुत मुश्किल काम होता है । लेकिन साधकों के लिए यह जरूरी गुण है ।

 

कई लोगों को एकांत नहीं भाता है । दो-चार लोग आगे-पीछे न रहें तो उनका मन ही नहीं लगता । लेकिन बिना एकांत सेवी हुए साधना दृढ़ नहीं होती । पुराने समय में साधक अधिकांश समय एकांत सेवी होकर ही बिताते थे और अच्छी साधना करते थे ।

 

यदि कोई साधक कहता है कि एकांत में तो मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता तो उसे इसे एक विशेष दुर्गुण के रूप में ही देखना चाहिए ।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

 

Tuesday, July 4, 2023

साधक की सोचनीयावस्था

जब कोई व्यक्ति साधना करते हुए आगे बढ़ता है तो कई अवस्थाएँ आती हैं । लेकिन इस कराल कलिकाल में किसी-किसी साधक के जीवन में कुछ विशेष अवस्थायें आ जाती हैं जिसे साधक की सोचनीयावस्था के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था का दायरा बहुत विस्तृत है । यहाँ पर कुछ स्थितियों का ही उल्लेख किया जा रहा है । गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज श्रीरामचरितमानस जी में ऐसी ही एक स्थिति की ओर संकेत करते हुए कहते हैं-


बैखानस सोइ सोचै जोगू । तप बिहाय जेहि भावै भोगू 

 

 अन्य अवस्थाएं थोड़ी कठिन हो सकती हैं और कठिनाई से प्राप्त हो सकती हैं । लेकिन सोचनीयावस्था में पहुँचने के लिए कोई विशेष कठिनाई नहीं होती है । बिना किसी विशेष स्थिति अथवा अवस्था में पहुँचे ही उस स्थिति का प्रदर्शन, दिखावा भी साधक की सोचनीयावस्था के अंतर्गत ही आता है ।

 

  जैसे भगवान की लीला में प्रवेश हुए बिना कहना, बताना कि अपना अथवा इनका लीला में प्रवेश हो चुका है । व्रह्म में लीन हुए बिना ही कहना कि मैं अथवा ये तो व्रह्म में लीन रहती हैं । स्त्री-पुरुष का भेद समाप्त हुए बिना ही कहना कि मैं अथवा अमुक स्त्री पुरुष के भेद से ऊपर उठ चुका है । आदि । इसीतरह माला छोड़ देना और कहना की माला की जरूरत नहीं है क्योंकि नाम की प्रतिष्ठा हो चुकी है इत्यादि ।

 

 किसी के जीवन में यह स्थिति अथवा अवस्था न आए तभी बेहतर है । साधक सोचनीयावस्था से बचकर साधना करता रहे इसी में उसकी भलाई होती है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

  

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