लोक एक ही है, भगवान एक ही हैं । लेकिन भाव और भावना के अनुसार वही लोक किसी को साकेत दिखता है, किसी को वैकुण्ठ दिखता है और किसी को गोलोक दिखता है-
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ।।
।। जय श्रीराम ।।
जो सदा अर्थात तीनों कालों में और सर्वत्र सत्य रहता है । वह ही शाश्वत कहलाता है । वही सनातन कहलाता है । और सनातन धर्म के अनुसार परमात्मा सत्य, शास्वत और सनातन है ।
नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये । आत्मारामाय रामाय सीतारामाय वेधसे ।।
नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम । नमस्ते चंडकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ।।
लोक एक ही है, भगवान एक ही हैं । लेकिन भाव और भावना के अनुसार वही लोक किसी को साकेत दिखता है, किसी को वैकुण्ठ दिखता है और किसी को गोलोक दिखता है-
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ।।
।। जय श्रीराम ।।
श्री रामजी जैसा स्वामी पाकर गोस्वामी जी बार-बार बलिहार जाते हैं । और कहते हैं कि रामजी को अपना स्वामी बना कर देखो ।
संसार में स्वामी की कमी नहीं है लेकिन श्रीराम जी जैसा स्वामी जो गुण ग्राही हो, अवगुण को दूर करने वाला हो, थोड़े में बहुत समझने वाला हो, कभी भी क्रोध न करने वाला हो, बहुत ही सरल हो, सबल हो, समर्थ हो, दीन-दुखियों से प्रेम करने वाला हो, जिसका कोई न सुनता हो उसका भी सुनने वाला हो, जिसे कोई भी न देखता हो उसे भी देखने वाला हो, सेवक से असीम स्नेह रखने वाला हो, एकबार अपनाकर कभी भी न छोड़ने वाला हो, माता-पिता की तरह सार-सँभार करने वाला हो; ऐसा कोई नहीं है ।
इसलिए एकबार रामजी को अपना बना के तो देखो ।
जब जीव यह मान लेता हैं कि यह मेरा है, मैंने किया है तो इससे समस्या आती है । मैं और मेरे की यह भावना बंधकारी है । मन के अशांति का कारण बनती है ।
कई लोग बुढ़ापे में यह सोचकर परेशान रहते हैं कि मेरा अब कुछ रह ही नहीं गया । सब बेटे और बहू का या पोते का हो गया । इससे अशांति में जीते हैं ।
ग्रंथों में ऐसा भी वर्णन मिलता है कि रावण को भी स्वप्न से यह पता चल गया था कि हनुमानजी अशोक वाटिका में आ गए हैं इसलिए ही रावण सीताजी को डराने-धमकाने आया था |
इसलिए रावण ने सीताजी से अशोभनीय बातें किया और उन्हें तलवार लेकर मारने दौड़ा और पिचासनियों को सीताजी को परेशान करने के लिए बोल कर गया जिससे हनुमानजी जाकर रामजी से ये सब बताएं और रामजी जल्दी आकर उसका वध कर दें ।
कलयुग के प्रभाव से निम्न लक्षणों से युक्त लोग कलियुग में बहुतायत
पाए जाते हैं ।
धन के मद में मतवाला होकर रहना । परम वाचाल होना अर्थात बकवास करने
वाला होना । उग्र वुद्धि वाला होना और बहुत बड़ा दंभी होना ।
कलियुग लोगों के मन को इस तरह से प्रभावित करता है कि लोग मतवाले
होकर, बकवादी, बात-बात में लड़ने-झगड़ने वाले और बहुत बड़े दंभी बनकर कलियुग का सहयोग
करते हैं । इस प्रकार से कलियुग लोगों को बरगलाकर रखता है । जिससे लोग नियम-नीति,
रीति, मान्यताओं और धर्म पथ से विमुख हो जाते है ।
।। जय श्रीराम ।।
साधु-संतों और साधकों के कई गुण कहे गए हैं । जिसमें से एक गुण है
इनका एकांत सेवी होना ।
हर कोई एकांत सेवी नहीं होता है । कई लोगों के लिए यह बहुत मुश्किल
काम होता है । लेकिन साधकों के लिए यह जरूरी गुण है ।
कई लोगों को एकांत नहीं भाता है । दो-चार लोग आगे-पीछे न रहें तो
उनका मन ही नहीं लगता । लेकिन बिना एकांत सेवी हुए साधना दृढ़ नहीं होती । पुराने
समय में साधक अधिकांश समय एकांत सेवी होकर ही बिताते थे और अच्छी साधना करते थे ।
यदि कोई साधक कहता है कि एकांत में तो मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता तो उसे इसे एक विशेष दुर्गुण के रूप में ही देखना चाहिए ।
।। जय श्रीराम ।।
भगवान के कई अवतार हुए हैं | लेकिन केवल दो अवतार ही हैं जो चतुर्व्यूह अवतार हैं | पहला रामावतार और दूसरा कृष्णावतार |
यही कारण है कि सनातन हिंदू धर्म में रामजी और कृष्णजी अधिक पूजे जाते हैं | इनका यशोगान अधिक होता है |
जब भगवान चार रूपों में अवतार लेते हैं तो वह अवतार चतुर्व्यूह अवतार कहा जाता है |
रामावतार में रामजी, भरतजी, लक्ष्मण जी और शत्रुघ्नजी का एक चतुर्व्यूह था | और कृष्णावतार में कृष्णजी, बलरामजी, प्रद्युम्नजी और अनिरुद्ध जी को मिलाकर चतुर्व्यूह पूरा हुआ था |
दोनों में यह अंतर था कि रामावतार में चार रूपों में भगवान लगभग एक साथ अवतरित हुए थे | जबकि कृष्णावतार में पहले बलराम जी फिर कृष्ण जी, फिर प्रद्युम्नजी कृष्ण जी के पुत्र के रूप में और अनिरुद्ध जी प्रद्युम्नजी के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे |
|| जय श्रीराम ||
सीढ़ियों में पायदान लगे होते है | पायदान पर पैर रखकर ऊपर जाया जाता है | सामान्यतः पायदान लकड़ी, लोहे आदि के बने होते हैं | लेकिन रावण के सिंहासन की सीढ़ी के पायदान ऐसे नहीं थे |
लंका का राजा रावण जिस सीढ़ी से अपने सिंहासन पर जाता था उस सीढ़ी के नव पायदान की जगह उसने नव ग्रहों को रख रखा था |
इस प्रकार रावण के सिंहासन की सीढ़ी के नव पायदान नौ ग्रह थे | रावण इनके ऊपर पैर रखते हुए अपने सिंहासन पर जाता था |
|| जय श्रीराम ||
जिसके माध्यम से सत्संग मिल रहा होता है उसका स्तर क्या है ? इस बात का अधिक महत्व होता है ।
लंका में लंकिनी नाम की एक दुष्ट राक्षसी रहती थी । उसे लंका की रक्षा का काम मिला हुआ था । हनुमानजी महराज के सत्संग से राक्षसी लंकिनी का भी विवेक जागृत हो गया । और उसे स्वर्ग और मोक्ष के सुख की अपेक्षा हृदय में कोशलपुर के राजा रामजी को हृदय में धारण करने का सुख श्रेष्ठत लगने लगा था ।
इसप्रकार कहा जा सकता है कि सत्संग में श्रोता और वक्ता दोनों का
स्तर महत्वपूर्ण होता है लेकिन इस घटना से पता चलता है कि वक्ता का स्तर श्रेष्ठ
होना ज्यादा जरूरी है । और जब वक्ता में हनुमानजी महाराज जी के कोटि की साधुता और भक्ति होगी तभी सत्संग में स्वर्ग और मोक्ष के सुख से अधिक सुख मिलने की बात सत्य और सार्थक होगी
हनुमानजी में बोलो बल कितना ।
कोई माप नहीं, है बल इतना ।।
दस सहस गज में बल जितना ।
एक दिग्गज में होता बल उतना ।।
दस सहस दिग्गज में बल जितना ।
एक एरावत में होता बल उतना ।।
दस सहस एरावत में बल जितना ।
एक इंद्र में होता है बल उतना ।।
दस सहस इंद्र में बल जितना ।
कनिष्ठा अगुंली में ही है बल इतना ।।
कोई कैसे कहेगा बल कितना ।
हनुमान जी में अतुलित बल जितना ।।
।। महावीर हनुमान जी की जय ।।
बार-बार राम को संभारि रामकाज हेतु रामदूत उड़ि चले ।
बल बुद्धि ज्ञान के निधान अंजना को लाल जैसो कौन मिले ।।
महावीर वेग ते पहाड़, नीर तरु आदि जोर-जोर ते हिले ।
पूरेगी मन आस रामदास खास, देखि देवतन के मन खिले ।।
।। जय हनुमान ।।
कई लोग अज्ञानता के कारण ऐसा कहते हैं कि राम जी ने कभी विराट रूप धारण नहीं किया था | जबकि ऐसा कहना बिल्कुल तथ्य हीन और भ्रामक है | और ऐसा कहने वालों की मूर्खता मात्र है |
रामजी ने कौशल्या जी को, हनुमान जी को और देवताओं, ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शंकर जी को विराट रूप दिखाया था | इस तथ्य का वर्णन क्रमशः श्रीरामचरितमानस जी, अद्भुत रामायण और स्कंद पुराण में मिलता है |
|| जय श्रीराम ||
एक संत श्रोताओं को उपदेश देते हुए कह रहे थे कि विवाह के बाद बेटियों से सभी सम्बन्ध समाप्त कर देना चाहिए |
वह मरे अथवा जिये इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए | विवाह कर दिया बस फिर कोई मतलब नहीं |
जब साधु, संत, कथा वाचक ही ऐसी बात करने लगेंगे तो और कोई क्या कर सकता है | जिसको सदराह दिखाना चाहिए वही गुमराह करने लगे तो देश समाज का पतन नहीं तो और क्या होगा ?
रामदास कलिकाल में, मति जाती है रूठ |
ठूठे को समुझत हरा, हरे पेड़ को ठूठ ||
|| जय श्रीराम ||
जो मोहरूपी कलिल का नाश करके सदा परमात्म पद का साक्षात्कार
कराती है, वह व्रह्मविद्या भी मुझ महेश्वर की आज्ञा के ही अधीन है । इस बिषय में
बहुत कहने से क्या लाभ यह सारा जगत मेरी शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है, मुझसे ही इस
विश्व का भरण-पोषण होता है तथा अंततोगत्वा सबका मुझमें ही प्रलय होता है-
बहुनात्र किमुक्तेन मम
शक्त्यात्मकंजगत ।।
मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं
ब्रजेत् ।।
।। जय श्रीराम ।।
वैसे तो भगवान का उपहास कोई नहीं कर सकता
क्योंकि आकाश पर थूकने की कोशिश करने वाला कभी सफल नहीं हो सकता । यह असंभव प्रयास है ।
कलियुग में कई लोग
भगवान को बहुत हल्का बनाने का प्रयास कर रहे हैं । जबकि भगवान में बड़ी गुरुता है ।
और इसलिए एकमात्र भगवान ही सचमुच के विश्व गुरू और जगदगुरू हैं ।
कोई भगवान के दर्शन
को, कोई लीला में प्रवेश को और कोई भगवद प्राप्ति को बहुत हल्का बता रहा है । कोई भगवान के नाम पर, कल्याण के नाम पर हल्का उपदेश कर रहा है । कोई अनुभवहीनता के चलते उल्टा-पुल्टा
अथवा गुमराह करने वाला उदेश कर रहा है ।
लोग सरल और बड़ा संत समझे इसलिए कोई कुछ कर अथवा बोल रहा है । अनुयाई बढ़ें इसलिए कोई कुछ कर या कह रहा है । लोग भक्त समझें, भगवद प्राप्त महापुरुष हैं ऐसा समझे इसलिए कोई कुछ बोल, कह अथवा कर रहा है ।
इनका लीला में प्रवेश हो चुका है, इनको भगवान का दर्शन हो चुका है, ये दर्शन करा सकते हैं, ये कल्याण करा सकते हैं, ये सबसे श्रेष्ठ है लोग ऐसा समझें इसलिए कोई कुछ कर, कह अथवा बोल रहा है ।
इस तरह कई लोग कुछ अलग करने, कहने अथवा बोलने में लगे हुए हैं ।
कुछ लोग यह बताने, समझाने, सिखाने में लगे हैं कि वेश सही है तो सब सही है, सब भगवान
ही हैं ।
इससे भगवान का उपहास हो सकता है । क्योंकि लोग ऐसा सोच सकते हैं, समझ
सकते हैं कि क्या सचमुच भगवान भी ऐसे हैं क्योंकि ये लोग तो ऐसे ही हैं और जैसे भी
हैं भगवान ही हैं ।
रामदास कलिकाल में, बनी रहै पहचान ।
जो मन भावै सो करैं, लीक तजन की ठान ।।
उल्टा-सीधा जो करैं, कहैं सोई उपदेश ।
रामदास भगवान सब, धरे जो सुंदर वेश ।।
महापुरुष सब जानिए, सब को भगवद
प्राप्त ।
रामदास कम न रुचै, छोभु जाय उर व्याप्त ।।
।। जय श्रीराम ।।